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बादामी। भारतीय विरासत। भाग 1

गोकाक और बादामी गुफाएँ

पिछले कुछ महीनों से ऋतुराज, मेरा बेटा, पीछे पड़ा था—“दिसंबर में छुट्टियाँ हैं, चलो कार से घूमने चलते हैं?” सच कहूँ तो आजकल उम्र के कारण इतने लंबे सफ़र का विचार आते ही मन में शंका आती है क्या हमसे यह सब हो पाएगा? लेकिन जिस जगह का उसने नाम लिया—वह प्राचीन वास्तु, वह भारतीय विरासत—उसे देखने की इच्छा बहुत प्रबल थी। सोचा, ऋतु है ना, वह संभाल लेगा… चलो, योजना बनाते हैं। Let’s Go Badami

चर्चाएँ, छुट्टियों का हिसाब, डॉक्टर की तारीखें इन सबके बीच तय हुआ कि 13 दिसंबर से 23 दिसंबर तक वह हमारे साथ रह सकेगा। आगे उसके और कार्यक्रम थे। रिश्तेदारों से भी पूछा गया, लेकिन किसी की तबीयत, किसी की छुट्टियाँ इन कारणों से लोग कम होते गए। अंत में 10–12 लोगों के साथ 2–3 गाड़ियों का सपना टूट गया। तय हुआ—हम पाँच लोग जाएंगे। उनमें ऋतु अकेला युवा, गाड़ी चलाने वाला, और हम चारों सत्तर पार के उनमें से एक तो कई बार ऑपरेशन झेल चुका था।

रिश्तेदार आश्चर्य से ऋतु को देख रहे थे—“तू इन्हें लेकर जा रहा है? वो भी बादामी? पहाड़ पर गुफाएँ देखने?” लेकिन अगर मन में ठान लिया जाए, तो इंसान क्या नहीं कर सकता—हमारी यह यात्रा उसी का उदाहरण बनी।

बादामी का हमारा मार्ग

यह लंबी दूरी की यात्रा सिर्फ पाँच दिनों की थी। 13 तारीख को मुंबई से पुणे पहुँचे और 14 की सुबह पुणे से तेज़ी से निकल पड़े। तय था कि शाम तक कर्नाटक का प्रसिद्ध झरना “गोकाक” देखना है। रास्ते में नाश्ता, भोजन करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। हर बार ऋतुराज हम बुज़ुर्गों का हाथ पकड़कर आगे ले जाता—हमें हँसी आ जाती।

गोकाक, बादामी से एक दिन पहले

अंधेरा होने से पहले हम “गोकाक” पहुँचे। मन में कई सवाल थे—पानी होगा या नहीं, दृश्य कैसा होगा? गूगल मैप्स ने साथ छोड़ दिया था, इसलिए स्थानीय लोगों से पूछना पड़ा। भाषा की कठिनाई थी। हमें कन्नड़ नहीं आती, और उनकी बोली “बुलेट ट्रेन” जैसी तेज़! तभी एक बुज़ुर्ग महिला मिली जो मराठी बोलती थी वाह! ऋतु ने तुरंत गाड़ी झरने के पास पहुँचा दी।

Gokak Near Badami

ऊपर से हमने झरना देखा बहुत कम पानी था। बारिश के मौसम का उसका रौद्र रूप अब नहीं था, बस दो पतली धाराएँ गिर रही थीं। थोड़ा निराशा हुई। नीचे प्लास्टिक और कचरा देखकर मन और खिन्न हुआ क्या हम कभी सुधरेंगे?

फिर भी, भारत की एक धरोहर देखने का संतोष मिला—गोकाक। यह कर्नाटक के बेलगावी ज़िले में स्थित है, घटप्रभा और मार्कंडेय नदियों के संगम पर। पास में एक पुरानी टेक्सटाइल मिल भी देखी 1887 में अंग्रेजों के समय बनी हुई। उसका पत्थर का काम बहुत सुंदर था।

Gokak Textile Mill near Badami

शाम को होटल पहुँचे। साधारण था, लेकिन एक रात के लिए ठीक था। अगली सुबह बदामी के लिए निकलना था।।

नाश्ते में एक मज़ेदार घटना हुई। मैंने पूछा—“यहाँ अलग-अलग तरह के डोसे मिलते होंगे?” जवाब मिला—“हम कोई साउथ इंडियन डिश नहीं बनाते—यही हमारी खासियत है!” सब हँस पड़े।

बादामी

बादामी का रास्ता भी खास अच्छा नहीं था, लेकिन वहाँ पहुँचते ही दृश्य बदल गया चारों तरफ विशाल लाल पत्थरों के पहाड़, अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य। ऐसा लगता था जैसे पत्थर खुद बोल रहे हों—“गीत गाया पत्थरों ने…”

Welcome to Badami

यह क्षेत्र चालुक्य राजाओं की राजधानी रहा है। यहाँ लगभग 150 मंदिर हैं—आइहोल, बादामी, पट्टदकल—इन सबका इतिहास गहराई से जुड़ा है।

होटल पहुँचकर थोड़ा आराम किया। वहाँ एक गाइड मिला, जिसने बताया कि गुफाओं तक पहुँचने के लिए लगभग 200 सीढ़ियाँ चढ़नी होंगी। हम थोड़ा घबरा गए, लेकिन उसने कहा—आराम-आराम से चढ़िए।

गुफाओं तक पहुँचने के लिए संकरी गलियों से होकर जाना पड़ा। बहुत भीड़ थी। किसी तरह हम पहली गुफा तक पहुँचे करीब 30–35 ऊँची सीढ़ियाँ चढ़कर। हर सीढ़ी लगभग 15–20 इंच ऊँची!

मेरी बड़ी बहन छड़ी के सहारे चढ़ रही थी। युवाओं ने देखकर कहा—“वाह दादी, आप हमारी प्रेरणा हैं!” ऋतु सबका हाथ पकड़कर ऊपर ले जा रहा था।

Lets climp Badami

बादामी की गुफाएँ

पहली गुफा शिव को समर्पित है। प्रवेश करते ही दाईं ओर नटराज की 18 भुजाओं वाली मूर्ति है—अद्भुत! सृष्टि, स्थिति, प्रलय, तिरोभाव और अनुग्रह—इन पाँच क्रियाओं का प्रतीक।

Bhootnath Temple, Badami

बादामी पर मराठी में मूल लेख का एक अंश

मी शांतपणे गुंफेतील मूर्ती निरखीत होते. कसे कोरले असेल? पूर्णपणे शंकराला समर्पित अशीही गुफा. ही सर्वात जुनी .आणखी वर तीन गुफा नंतर तयार झालेल्या. पहिल्याच दालनात शिरण्याआधी चढताक्षणी उजवीकडे नटराजाची मूर्ती दिसते. १८ हातांची १८ नृत्य मुद्रा बघूनच आपण अवाक होतो.शिवाय साप, डमरू आणि त्रिशूळ आहेच .
नटराज बघताना मला आठवतात माझे शिल्पकार गुरू. त्यांनी तयार केलेली नटराजाची मूर्ती . त्यांनी दाखविलेली कुमार स्वामींची पुस्तकं.. रामचंद्र शुक्ल यांचे निबंध
सृष्टी, स्थिती, प्रलय, तिरोभाव आणि अनुग्रह या पाच क्रियांवर आधारित हे त्रैलोक्यमंगल नृत्य. ते सांगत..अनंत ब्रह्मांडाचे केंद्र चिदंबरम् आपल्यात ही असते कारण आपण पिंड ना ? तेथे नटराज सदैव नाचतच असतो. हे नृत्य जीवात्माला दिसत नाही
खरे आहे…कैलास लेणे बघताना ही मला असेच झाले होते…आपल्या अंतरी, आपल्या मनाच्या आतील गाभाऱ्यात जोवर हे झळाळून उठत नाही तोवर त्याची अनुभूती कशी होणार ? आपण सारी सामान्य माणसं . !
या नृत्याच्या मागे ही तीन मुद्दे आहेत .
१…संपूर्ण विश्वाच्या गतिमानतेचे प्रतीक
२ ..संपूर्ण जीवांना अज्ञानातून मुक्त करणे
आणि
३ म्हणजे फक्त चिदंबरम् मध्ये होत नसून साऱ्या मानवमात्रांच्या हृदयात होत असणारे हे नृत्य
त्या मूर्तीला नीट बघ ऋतू..डमरू म्हणजे निर्मिती चे चिह्ण, शंकराचा अभयहस्त हे संरक्षण, उचललेला पाय म्हणजे मुक्ती आणि चिरडलेला राक्षस हा अज्ञानाचे, अंधाराचे प्रतीक आहे.

भीतर अर्धनारीश्वर, हरिहर जैसी मूर्तियाँ हैं। फिर दूसरी गुफा—विष्णु को समर्पित—जहाँ वराह और त्रिविक्रम के सुंदर शिल्प हैं। तीसरी गुफा और भी भव्य—विष्णु के विभिन्न रूप, सुंदर नक्काशी।

चौथी गुफा जैन पंथ से संबंधित है—छोटी लेकिन आकर्षक।

भूतनाथ मंदिर, बादामी

ऊपर से अगस्त्य तीर्थ का दृश्य दिखता है—नीले पानी का बड़ा तालाब और उसके पास भूतनाथ मंदिर—अद्भुत दृश्य।

Bhootnath mandir, Badami

नीचे आकर हमने तय किया कि कुछ लोग होटल लौटेंगे और मैं और ऋतु आगे देखेंगे। रास्ते में बच्चों को खेलते देखा—बहुत प्यारा दृश्य था।

शाम को फिर भूतनाथ मंदिर गए। वहाँ की वास्तुकला, जलाशय के किनारे बना मंदिर—सब कुछ मन मोह लेने वाला था। पुराने समय की कला देखकर मन में प्रश्न उठता रहा—आज हम वैसा क्यों नहीं बना पाते?

evening at Bhootnath Temple, Badami

रात को होटल लौटकर गरमागरम खाना खाया और अगले दिन की योजना बनाकर आराम किया।

भाग 2 पट्टदकल पढ़ना जारी रखें

श्रीमती स्वाती वर्तक,
खार (पश्चिम), मुंबई

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